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Strange Story Behind Jagannath Rath Yatra : रथयात्रा का रहस्यमय इतिहास: क्यों होती है जगन्नाथजी की ऐसी मूर्ति?

On: July 31, 2025 6:33 AM
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Strange Story Behind Jagannath Rath Yatra
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Strange Story Behind Jagannath Rath Yatra : जगन्नाथ रथ यात्रा, भारत के सबसे भव्य और आध्यात्मिक उत्सवों में से एक, न केवल अपनी विशालता और भक्ति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसके पीछे छिपी रहस्यमयी कहानियों और परंपराओं के लिए भी। ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में हर साल आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित होने वाली यह यात्रा लाखों भक्तों को आकर्षित करती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस रथ यात्रा के पीछे कई विचित्र और आश्चर्यजनक कहानियाँ हैं, जो इसे और भी रहस्यमयी बनाती हैं? इस लेख में, हम जगन्नाथ रथ यात्रा के इतिहास, पौराणिक कथाओं, और छिपे हुए रहस्यों का गहन विश्लेषण करेंगे।

जगन्नाथ रथ यात्रा का परिचय

जगन्नाथ रथ यात्रा पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर से शुरू होती है, जहाँ भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र, और बहन सुभद्रा तीन विशाल रथों पर सवार होकर गुंडीचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यह यात्रा लगभग 3 किलोमीटर की दूरी तय करती है और इसमें लाखों भक्त रथों को खींचने और दर्शन करने के लिए एकत्रित होते हैं। नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भगवान नौ दिन बाद वापस अपने मंदिर लौटते हैं। यह यात्रा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि सामाजिक समरसता और एकता का प्रतीक भी है, क्योंकि इसमें हर वर्ग और समुदाय के लोग शामिल होते हैं।

पौराणिक कथाएँ और उत्पत्ति

जगन्नाथ रथ यात्रा की उत्पत्ति स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, और पद्म पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है। एक प्रमुख कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर, गुंडीचा मंदिर, में अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ नौ दिनों के लिए विश्राम करने जाते हैं। यह कथा भगवान की मानवीय लीलाओं को दर्शाती है, जो उन्हें भक्तों के करीब लाती है।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण की मृत्यु के बाद उनके हृदय को एक पवित्र लकड़ी के रूप में संरक्षित किया गया, जिसे बाद में जगन्नाथ की मूर्ति में स्थापित किया गया। इस लकड़ी को “ब्रह्म पदार्थ” कहा जाता है, और इसे हर 12 या 19 साल में नबकालेबर (नई मूर्ति निर्माण) के दौरान बदला जाता है। यह प्रक्रिया अत्यंत गोपनीय और रहस्यमयी है, जिसे केवल विशेष पुजारी ही संपन्न करते हैं।

रथ यात्रा के छिपे हुए रहस्य

1. अधूरी मूर्तियों का रहस्य

जगन्नाथ, बलभद्र, और सुभद्रा की मूर्तियाँ अधूरी दिखाई देती हैं, जिनके हाथ-पैर पूर्ण रूप से निर्मित नहीं हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने विश्वकर्मा को मूर्तियाँ बनाने का कार्य सौंपा था, लेकिन विश्वकर्मा ने शर्त रखी कि कोई भी उनके काम को बीच में न देखे। जब राजा ने अधूरी मूर्तियों को देख लिया, तो विश्वकर्मा ने काम छोड़ दिया। भगवान ने स्वयं कहा कि वे इसी रूप में पूजे जाएँगे। यह अधूरापन भगवान की सर्वव्यापी और अनंत प्रकृति का प्रतीक माना जाता है।

2. रथों का उल्टा घूमना

जगन्नाथ के रथ, जिसे “नंदीघोष” कहा जाता है, के पहिए उल्टे दिशा में घूमते हुए प्रतीत होते हैं। यह एक ऑप्टिकल भ्रम है, लेकिन भक्त इसे भगवान की चमत्कारी शक्ति मानते हैं। इसके अलावा, रथों को खींचने की प्रक्रिया में कभी-कभी रथ बिना किसी स्पष्ट कारण के रुक जाता है, जिसे “छेरा पहरा” के दौरान पुजारी विशेष अनुष्ठान करके हल करते हैं।

3. ब्रह्म पदार्थ का गोपनीय स्थानांतरण

नबकालेबर के दौरान, पुरानी मूर्तियों से “ब्रह्म पदार्थ” को नई मूर्तियों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया अंधेरे में और पूर्ण गोपनीयता के साथ की जाती है। इस दौरान पुजारी की आँखें ढकी रहती हैं, और ऐसा माना जाता है कि इस प्रक्रिया को देखने वाला कोई भी जीवित नहीं रहता। यह रहस्य जगन्नाथ की दिव्यता को और गहरा करता है।

4. समुद्री हवा का रहस्य

पुरी में दिन के समय समुद्र से जमीन की ओर हवा बहती है, लेकिन रथ यात्रा के दौरान यह हवा उल्टी दिशा में, यानी जमीन से समुद्र की ओर, बहने लगती है। वैज्ञानिक इसका कोई ठोस कारण नहीं बता पाए हैं, और भक्त इसे भगवान की इच्छा मानते हैं।

5. रथों का निर्माण और पुनर्जनन

हर साल रथ यात्रा के लिए तीन नए रथ बनाए जाते हैं, जिन्हें विशेष लकड़ियों और पारंपरिक तरीकों से तैयार किया जाता है। जगन्नाथ का रथ 45 फीट ऊँचा और 35 फीट चौड़ा होता है, जिसमें 16 पहिए होते हैं। बलभद्र का रथ “तलध्वज” और सुभद्रा का रथ “देवदलन” भी विशाल होते हैं। रथ निर्माण में कोई कील या पेंच नहीं इस्तेमाल होता, जो प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग की कुशलता को दर्शाता है।

Strange Story Behind Jagannath Rath Yatra
Strange Story Behind Jagannath Rath Yatra

रथ यात्रा का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। इस यात्रा में जाति, धर्म, और लिंग का कोई भेद नहीं होता। भगवान जगन्नाथ को “पटित पावन” (पापियों का उद्धारक) कहा जाता है, और उनकी यात्रा सभी के लिए सुलभ होती है। यह उत्सव विश्वभर में भारतीय डायस्पोरा के बीच भी लोकप्रिय है, और अहमदाबाद, कोलकाता, और विदेशों में जैसे लंदन और न्यूयॉर्क में भी रथ यात्राएँ आयोजित की जाती हैं।

रथ यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पहलू है इसका आर्थिक प्रभाव। पुरी में इस दौरान लाखों पर्यटक और तीर्थयात्री आते हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है। हस्तशिल्प, भोजन, और आतिथ्य उद्योग इस अवसर पर फलते-फूलते हैं।

रथ यात्रा की चुनौतियाँ

जगन्नाथ रथ यात्रा के आयोजन में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा, और पर्यावरण संरक्षण। 2014 में रथ यात्रा के दौरान भगदड़ की स्थिति बनी थी, जिसके बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त किया। इसके अलावा, रथ निर्माण के लिए हर साल पेड़ों की कटाई पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय है। हाल के वर्षों में, टिकाऊ लकड़ी उपयोग और वृक्षारोपण की पहल शुरू की गई हैं।

रथ यात्रा में भाग लेने की योजना

यदि आप जगन्नाथ रथ यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो पुरी की यात्रा की योजना पहले से बनाएँ। निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर (60 किमी) और रेलवे स्टेशन पुरी में है। यात्रा के दौरान ठहरने और भोजन की व्यवस्था के लिए पहले से बुकिंग करें। रथ यात्रा के दौरान पुरी का मौसम गर्म और आर्द्र होता है, इसलिए हल्के कपड़े और पानी साथ रखें।

जगन्नाथ रथ यात्रा एक ऐसा उत्सव है जो आध्यात्मिकता, संस्कृति, और रहस्य का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करता है। इसकी विचित्र कहानियाँ, जैसे अधूरी मूर्तियाँ, ब्रह्म पदार्थ, और उल्टी हवा, इसे विश्व के सबसे आकर्षक धार्मिक आयोजनों में से एक बनाती हैं। यह यात्रा न केवल भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्ति का प्रतीक है, बल्कि मानवता की एकता और समरसता को भी दर्शाती है। यदि आप इस चमत्कारी यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो अगली रथ यात्रा में पुरी जरूर जाएँ और इस अनुभव को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।क्या आप जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल होना चाहेंगे? अपनी यात्रा की योजना बनाएँ और इस पवित्र उत्सव के रहस्यों को स्वयं अनुभव करें।

Anand K.

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